
नई दिल्ली: यूनाइटेड किंगडम और भारत के बीच हुए कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) के लागू होने के बाद व्यापारिक सहयोग की दिशा में एक नई शुरुआत हुई है। इस समझौते के तहत GI-टैग वाली स्कॉटिश सैल्मन मछली की पहली बिना टैरिफ वाली खेप शुक्रवार को भारत पहुंची।
इस पहली खेप की कीमत करीब 800 डॉलर है और इसका वजन 82 किलोग्राम है। इसे UK-भारत CETA की शुरुआती सफलताओं में से एक माना जा रहा है, क्योंकि इस समझौते के जरिए दोनों देशों के बीच कई उत्पादों के व्यापार को आसान बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
CETA लागू होने के बाद पहली बड़ी खेप
ताजा स्कॉटिश फार्म्ड सैल्मन की यह खेप UK-भारत CETA लागू होने के लगभग दो सप्ताह बाद भारत पहुंची। यह व्यापार समझौता 15 जुलाई 2026 से प्रभावी हुआ था।
इस खेप को स्कॉटलैंड की कंपनी बक्काफ्रॉस्ट स्कॉटलैंड ने तैयार किया है, जबकि भारत में इसका आयात बेंगलुरु स्थित साशिमी फूड्स प्राइवेट लिमिटेड ने किया।
व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, टैरिफ में छूट मिलने से आयातकों को लागत कम करने में मदद मिलेगी और भारतीय उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता वाले अंतरराष्ट्रीय खाद्य उत्पादों तक बेहतर पहुंच मिल सकती है।
GI टैग से मिली अलग पहचान
स्कॉटिश सैल्मन को उसकी गुणवत्ता, उत्पादन प्रक्रिया और क्षेत्रीय पहचान के कारण विशेष महत्व प्राप्त है। GI (Geographical Indication) टैग किसी उत्पाद को उसकी भौगोलिक पहचान और विशिष्ट विशेषताओं के आधार पर मान्यता देता है।
GI टैग वाले उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर पहचान और भरोसा मिलता है। स्कॉटिश सैल्मन भी इसी पहचान के कारण प्रीमियम समुद्री खाद्य उत्पादों में शामिल है।
भारत में बढ़ रही है प्रीमियम सी-फूड की मांग
भारत में पिछले कुछ वर्षों में प्रीमियम सी-फूड की मांग तेजी से बढ़ी है। खासकर बड़े शहरों में रेस्टोरेंट, होटल और फाइन डाइनिंग सेक्टर में उच्च गुणवत्ता वाली मछलियों की मांग बढ़ी है।
सैल्मन मछली का इस्तेमाल खासतौर पर जापानी व्यंजन जैसे सुशी और साशिमी में किया जाता है। बेंगलुरु जैसी जगहों पर इस तरह के अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों की लोकप्रियता बढ़ने के कारण आयातित सी-फूड की मांग भी बढ़ी है।
व्यापार संबंधों को मजबूत करने की दिशा में कदम
UK-भारत CETA दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया एक महत्वपूर्ण समझौता है। इसके तहत कई क्षेत्रों में व्यापार को आसान बनाने, शुल्क कम करने और बाजार पहुंच बढ़ाने की कोशिश की गई है।
पहली टैरिफ-फ्री सैल्मन खेप को दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक सहयोग के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।
ब्रिटेन की ओर से भी इसे समझौते के प्रभावी होने के बाद व्यापारिक अवसरों के विस्तार का उदाहरण बताया गया है। वहीं, भारतीय आयातकों को उम्मीद है कि इस तरह के समझौतों से विदेशी उत्पादों की उपलब्धता बढ़ेगी।
आयातकों को मिलेगी लागत में राहत
आयात करने वाली कंपनी साशिमी फूड्स प्राइवेट लिमिटेड के लिए यह खेप एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। टैरिफ में कमी या समाप्ति से आयात लागत कम होने की संभावना है, जिसका फायदा आगे चलकर ग्राहकों तक पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापार समझौतों के जरिए केवल बड़े उद्योगों को ही नहीं, बल्कि खाद्य, कृषि और समुद्री उत्पादों जैसे क्षेत्रों को भी लाभ मिल सकता है।
आगे बढ़ सकते हैं नए व्यापारिक अवसर
स्कॉटिश सैल्मन की पहली टैरिफ-फ्री खेप के बाद दोनों देशों के बीच अन्य उत्पादों के व्यापार को भी गति मिलने की उम्मीद है।
CETA के जरिए भारत और UK अपने आर्थिक संबंधों को और मजबूत करना चाहते हैं। आने वाले समय में खाद्य उत्पादों, विनिर्माण, सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में व्यापारिक गतिविधियों के बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
यह पहली खेप इस बात का संकेत है कि नए व्यापार समझौते केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके जरिए वास्तविक कारोबारी अवसर भी पैदा हो रहे हैं।





